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सिंधु जल संधि पर विवाद: क्या भारत इसे एकतरफा खत्म कर सकता है? जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत इस संधि को एकतरफा समाप्त या संशोधित नहीं कर सकता, जबकि भारत ने संधि को निलंबित रखने का फैसला बरकरार रखा है। आइए जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून इस मामले में क्या कहता है।

Indus Waters Treaty
Updated: 7/2/2026, 2:03:26 PM
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सिंधु जल संधि पर बढ़ा विवाद

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर विवाद जारी है। भारत द्वारा संधि को निलंबित रखने के फैसले के बाद पाकिस्तान लगातार दावा कर रहा है कि इस समझौते को दोनों देशों की सहमति के बिना न समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें बदलाव किया जा सकता है।

सिंधु जल संधि क्या है?

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1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत छह नदियों का जल बंटवारा तय किया गया।

  • पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का प्रमुख उपयोग अधिकार मिला।
  • भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों के उपयोग का अधिकार दिया गया।
  • कुल जल प्रवाह का लगभग 80% हिस्सा पाकिस्तान और 20% हिस्सा भारत के हिस्से में आता है।

क्या भारत संधि को एकतरफा समाप्त कर सकता है?

संधि के मूल प्रावधानों में किसी भी पक्ष के लिए एकतरफा रूप से समझौता समाप्त करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि संधि को समाप्त करना हो तो दोनों देशों के बीच नए समझौते पर सहमति आवश्यक मानी जाती है।

हालांकि भारत ने संधि को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया है, बल्कि इसके कुछ प्रक्रियात्मक पहलुओं को निलंबित किया है।

भारत ने क्या कदम उठाए हैं?

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भारत ने अब तक:

  • स्थायी सिंधु आयोग की बैठकें रोक दी हैं।
  • जल संबंधी हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना बंद किया है।
  • विवाद समाधान प्रक्रियाओं में भागीदारी सीमित की है।
  • फिलहाल भारत ने नदियों के जल प्रवाह को मोड़ने जैसा कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है।

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

  • संधि कानून पर आधारित वियना कन्वेंशन के दो अनुच्छेद इस मामले में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
  • अनुच्छेद 60 किसी पक्ष द्वारा गंभीर उल्लंघन की स्थिति में संधि को निलंबित करने की अनुमति देता है।
  • अनुच्छेद 62 परिस्थितियों में मूलभूत और अप्रत्याशित बदलाव होने पर संधि समाप्त करने का आधार प्रदान करता है।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने अब तक औपचारिक रूप से इन प्रावधानों का उपयोग नहीं किया है।

जलवायु परिवर्तन भी बन सकता है तर्क

कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 1960 के मुकाबले आज सिंधु बेसिन की परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। ग्लेशियरों का पिघलना, अनियमित मानसून, बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन जैसी परिस्थितियां भविष्य में संधि की समीक्षा का आधार बन सकती हैं।

हालांकि अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ऐसे मामलों में "मूलभूत परिवर्तन" के तर्क को स्वीकार करने में काफी सतर्क रहते हैं।

समझौतों के पालन का सिद्धांत

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अंतरराष्ट्रीय कानून में "Pacta Sunt Servanda" सिद्धांत लागू होता है, जिसका अर्थ है कि सभी अंतरराष्ट्रीय समझौतों का ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए। इसी सिद्धांत का उल्लेख वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 26 में भी किया गया है।

विवाद अभी जारी

सिंधु जल संधि को लेकर दोनों देशों के बीच कानूनी और कूटनीतिक मतभेद बने हुए हैं। भारत अपने सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों का हवाला दे रहा है, जबकि पाकिस्तान संधि की बाध्यता का दावा कर रहा है। ऐसे में इस मुद्दे का अंतिम समाधान दोनों देशों की बातचीत या अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

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