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- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 से 11 जुलाई तक इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की छह दिवसीय यात्रा पर जाएंगे।
- विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इस दौरे का उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना है। इंडोनेशिया में पीएम मोदी राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो से मुलाकात करेंगे,

- जबकि ऑस्ट्रेलिया में उनकी प्रमुख बैठकें मेलबर्न में होंगी। दौरे का समापन न्यूजीलैंड में होगा।
न्यूजीलैंड के साथ 40 साल बाद ऐतिहासिक मुलाकात
- इस यात्रा का सबसे खास पहलू न्यूजीलैंड है। प्रधानमंत्री मोदी वहां लगभग 40 साल बाद जा रहे हैं। आखिरी बार राजीव गांधी 1986 में गए थे। पीएम मोदी ऑकलैंड में दो दिन का राज्य स्तरीय दौरा करेंगे, जहां वह प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन से मुलाकात करेंगे।
ऑकलैंड में होने वाला है बड़ा कार्यक्रम
- भारतीय समुदाय के लिए भी बड़ा कार्यक्रम होने वाला है। ऑकलैंड में 'किआ ओरा मोदी' जैसे कार्यक्रम की तैयारी चल रही है, जहां हजारों भारतीय मूल के लोग शामिल होंगे। दोनों देशों के बीच हाल ही में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ है, जिसमें न्यूजीलैंड के 95 प्रतिशत सामान पर टैरिफ खत्म हो गए हैं। इस यात्रा से व्यापार, रोजगार और निवेश को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है।
- इस यात्रा की शुरुआत इंडोनेशिया से होगी। प्रधानमंत्री प्रबोवो सुबियांतो से मुलाकात में रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा जैसे मुद्दों पर बात होगी।
- जकार्ता में द्विपक्षीय वार्ता के साथ-साथ भारतीय समुदाय के लिए भी कार्यक्रम रखा गया है। योग्यकर्ता में प्रम्बानन मंदिर का दौरा सांस्कृतिक संबंधों को और गहरा करेगा।
- इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया का बड़ा देश है और दोनों देशों के बीच पहले से अच्छे संबंध हैं। इस यात्रा से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच भारत और इंडोनेशिया की साझेदारी मजबूत होगी।
- ऑस्ट्रेलिया का दौरा क्यों अहम?
- प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया में प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज से मुलाकात मेलबर्न या सिडनी में हो सकती है। क्वाड देश के रूप में ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा, सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स, शिक्षा और व्यापार पर चर्चा होगी। मेलबॉर्न में भारतीय समुदाय के लिए बड़ा कार्यक्रम प्रस्तावित है, जहां पीएम मोदी लोगों को संबोधित करेंगे।
- ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लाखों लोग हैं, जो दोनों देशों के बीच पुल का काम करते हैं। इस दौरे से निवेश और शिक्षा क्षेत्र में नए समझौते हो सकते हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार पूरा फोकस हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की साझेदारी को नई ऊंचाई देने पर है।
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