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पद्म विभूषण पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन, 70 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस; लोक कला जगत में शोक

पद्म विभूषण और प्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में रायपुर एम्स में निधन हो गया। उन्होंने पंडवानी लोक गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।

Teejan Bai Death
Live UpdateUpdated: 7/5/2026, 5:53:39 AM
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पद्म विभूषण पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन, 70 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस; लोक कला जगत में शोक

रायपुर: छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात रायपुर एम्स में निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उपचाराधीन थीं। उनके निधन से भारतीय लोक कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में किया जाएगा।

पंडवानी को दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

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तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली के माध्यम से पंडवानी लोक गायन को देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में नई पहचान दिलाई। उन्होंने महाभारत की कथाओं को मंच पर जीवंत अंदाज में प्रस्तुत कर इस लोक कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। भारतीय लोक संस्कृति में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया था।

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री ने जताया शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा को पूरी दुनिया तक पहुंचाया और उनका निधन भारतीय कला एवं संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपने अद्भुत पंडवानी गायन से राज्य और देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया।

महाभारत की कहानियों से शुरू हुआ सफर

24 अप्रैल 1956 को भिलाई के निकट गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई बचपन से ही अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कहानियां सुनती थीं। इन्हीं कथाओं ने उनके भीतर पंडवानी गायन के प्रति गहरी रुचि पैदा की। बाद में प्रसिद्ध लोक कलाकार उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया।

महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी का प्रदर्शन किया। उस दौर में जहां महिलाएं बैठकर वेदमती शैली में प्रस्तुति देती थीं, वहीं तीजन बाई पहली महिला बनीं जिन्होंने खड़े होकर कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत कर परंपरा को नई दिशा दी।

संघर्षों के बीच हासिल की बड़ी पहचान

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तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पंडवानी गायन को अपनाने के कारण उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा और एक समय उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा। बावजूद इसके उन्होंने अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा और लगातार देश-विदेश में प्रस्तुतियां देकर पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

दिलचस्प बात यह है कि वह नियमित रूप से स्कूल नहीं जा सकीं, लेकिन अपनी असाधारण कला के दम पर उन्हें चार बार डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (D.Litt.) की मानद उपाधि प्रदान की गई।

पिछले कुछ समय से थीं बीमार

पिछले करीब दो वर्षों से तीजन बाई विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। हाल के दिनों में उनकी तबीयत अधिक बिगड़ने पर उन्हें एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार उनका उपचार कर रही थी। उम्र संबंधी जटिलताओं और सांस लेने में तकलीफ के कारण उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी।

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