Fact Checked
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- समिति की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित अधिकारी के पक्ष में वर्ष 1984 में विदिशा जिले से अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाणपत्र जारी किया गया था।
- उपलब्ध अभिलेखों में संबंधित अधिकारी के मूल निवासी होने से जुड़े तथ्यों को लेकर भी जांच में प्रश्न सामने आए हैं।
- सतर्कता शाखा द्वारा प्रकरण की जांच में पता चला है कि पुलिस सेवा में नियुक्ति से पूर्व मीणा ने शासकीय शिक्षक के रूप में सेवा के दौरान स्वयं को अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थी के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
- पुलिस यह भी देख रही है कि जाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया नियमों और निर्धारित दस्तावेज के अनुरूप की गई या नहीं।
- पुलिस महानिरीक्षक विजिलेंस ने 2009 में छानबीन समिति को शिकायत की थी कि मीणा अजजा के नहीं हैं।
- वर्ष 2016 में समिति ने भी शिकायत को सही ठहराया था। उधर, रघुवीर सिंह मीणा का कहना है कि आरोप सही नहीं हैं। मेरा मामला हाई कोर्ट में डबल बेंच में विचाराधीन है।
उप निरीक्षक के विरुद्ध भी फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में अपराध दर्ज, बर्खास्तगी की तैयारी
पुलिस के एक उप निरीक्षक के विरुद्ध भी अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने का जबलपुर से फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करने के आरोप में सीआईडी थाने में अपराध पंजीबद्ध किया गया है।
उसने इस प्रमाण पत्र के आधार पर वर्ष 2000-01 में पुलिस में नियुक्ति प्राप्त की थी। शासन स्तर पर गठित छानबीन समिति की जांच में उसका जाति प्रमाण पत्र फर्जी बताया गया था। आरोपित को सेवा से बर्खास्त करने की भी कार्रवाई की जा रही है।
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